देशवासियों, प्रधान सेवक, उसके सहयोगियों और चमचों के नाम एक खुला खत

नमस्कार और लाल सलाम,

देश में संघियों और ब्राह्मणवाद ने जिस तरह का माहौल खड़ा कर दिया है उस सबको देख कर मुझे यह खुला खत लिखने और उसमें लाल सलाम लिखने की जरूरत महसूस हुई। खत देश के लोगों, प्रधानसेवक और उसके प्यादों के नाम है। भक्त जो यहाँ यह भौंकने के लिए कमेंट करना चाहते हैं कि तुम्हे बोलने की तमीज नहीं है या ऐसा कुछ वो पहले अपनी माँ की इज़्ज़त करना सीखें उसका ध्यान रखें बाद में यहाँ भौंकने की हिम्मत करें। और किसी के लिए इज़्ज़त भरे शब्द यहाँ लिखे जायेंगे इसकी उम्मीद तो बिलकुल मत करें क्यूंकि इज़्ज़त उनको दी जाती है जो इस लायक हों। सत्ताधारियों के आगे कुत्तों की तरह दम हिलाने वाले लाल सलाम बोलने की हिम्मत नहीं करते।

बहुत दिनों से देश में बन रहे माहौल को देख रहा था और परेशान था कि कैसे कुछ लोग एक निहत्थे आदमी/ औरत को घेर डंडों, लाठियों या हथियारों से पिटाई करते हैं और जान निकाल लेते हैं। इतना सब कुछ देखने और वीडियो बनाने के लिए बहुत मजबूत जिगर वाले कुछ लोग नपुंसकों की तरह तमाशा देखने लगे रहते हैं पर किसी की हिम्मत नहीं होती कि उन गुंडों पर टूट पड़े ताकि दोबारा किसी की हिम्मत न पड़े यह सब करने की।

मेरे देश की जनता जनार्दन जिसे चुनावों के दौर में 100 रूपये देकर भी खरीदा जा सकता है उस से मैं कहना चाहता हूँ:

मित्रों (सम्बोधन के लिए यही बाँग मुझे ठीक लगी क्योंकि इसे सुनकर लोग झूम उठते हैं) !!

मारे जा रहे लोग मुस्लिम हैं सिख हैं या दलित मैं इस बारे में कुछ नहीं बोलूंगा। मरने वाला चाहे जुनैद हो या बंता सिंह। कांड चाहे गुजरात में हुआ हो या सहारनपुर या यूपी या पटिआला मरने वाला हिन्दू हो या मुस्लिम या कोई और मौत सबको लेकर ही जाती है। मसला यहाँ यह है कि जिसकी शह पर यह सब हो रहा है वो पर्दे के पीछे से सारा खेल खेल रहा है। और तुम लोग सब कुछ जानते हुए भी अंधों की तरह बर्ताव कर रहे हो। ऐसे बर्ताव कर रहे हो जैसे कुछ देखा ही नहीं और न ही किसी भीड़ में रोने कराहने की आवाज़ तुम्हे सुनाई दे रही हो। क्या तुम उसी दिन जागोगे जिस दिन तुम्हारी अपनी बेटी उठायी जायेगी या तुम्हारी माँ की आबरू पर आंच आएगी?? या उस दिन भी गूंगे बेहरे बने रहोगे?? क्या उस दिन भी नहीं बोलोगे जिस दिन तुम्हारे बाप को कोई इस तरह भरे बाजार पीटेगा? लोगों की चीखें सुनकर भी कुछ नहीं करोगे तो दिन तुम्हारे भी आएगा। तुम किसी वीआईपी की औलाद नहीं हो मारने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं कि तुम हिन्दू हो या मुस्लिम उसे मारने के लिए पैसे मिले हैं और इलाके पर कब्ज़ा दिए जाने का लालच भी, बचना चाहते हो तो आवाज़ उठाना सीखो। तुम्हारे पुरखों ने देश की आज़ादी के लिए सत्याग्रह भी किया और जानें भी दीं तुम निठल्ले, आलस और डर के मारे जोर से खांसने से भी घबराने लगे हो तो अंजाम तुम्हारा भी वही होगा जो दूसरी जाति या धर्म के लोगों के साथ हुआ है। तुमने आज आवाज न उठाई तो तुम्हारी माँ, बहन, बेटी भी उठायी जायेगी और उस वक़्त भी लोग नपुंसकों की तरह खड़े हो तमाशा देखेंगे जैसे आज तुम देख रहे हो। इतने बेदर्द और कब से हो चुके हो कि किसी को मरता देख बिना कुछ किये घर पहुँच जाते हो चुप चाप और रात भर नींद ले अगले दिन काम पर हाजिर हो जाते हो ??

मंदिर में सिर बाद में झुका लेना, मस्जिद में सजदा बाद में कर लेना और गुरुद्वारे में शीश बाद में झुका लेना पहले इंसान बनकर इंसान की मदद करना सीखो और गलत के खिलाफ आवाज़ उठाना सीखो। उस पार्टी उस संगठन उन लोगों का बायकाट करो जो हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। नहीं तो कल किसी को मुंह दिखने की बात तो छोड़ो खुद से नज़रें मिलाने लायक नहीं रह पाओगे।

अब चंद शब्द प्रधानसेवक के लिए:

कैमरे के सामने पोज़ देने, मंच पर आंसू बहाने और लम्बी लम्बी फेंकने से देश चलने वाला होता तो आज भारत दुनिया का सबसे महान देश होता। बात बहुत दुःख की है कि कुछ लोगों का दम टीवी पर बिकाऊ मीडिया द्वारा आयोजित कार्यक्रमों/ इंटरव्यू के दौरान ही देखने को मिला। वैसे तो वो पडोसी मुल्क जिसे वो हर जगह दुश्मन कहते फिरते हैं के नाती-पोतों की शादियों में झूमते पाए गए। सरहद पार से सर काट के लाने का वायदा था। गए तो लेकिन चाय की चुस्की लेने। डिग्री से लेकर दहाड़ जिसकी शक के घेरे में हो उसे सम्मान देने के मूड में मैं तो बिलकुल नहीं हूँ।

तुम समझ तो गए होंगे यहाँ ज़िक्र किसी गैर का नहीं बल्कि तुम्हारा ही हो रहा है। आखिर दुनिया में कौन इतना वफादार है जो हर कदम अपने दुःख सुख के साथी अम्बानी-अडानी, मालया और जिंदल के फायदे के लिए उठाये? कौन है जो पूरे देश को कतार में खड़ा कर लाइव टीवी पर रोने नाटक करे और चोर रास्ते से अपने चहेतों का पैसा बदलवाने के लिए नीतियां बना दे। लोग कतार में थे और तुमने अपने गरीब दोस्तों का करोड़ों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया किसी को भनक भी न लगी। ऐसा तो कोई चालाक बनिया ही कर सकता है। पर अच्छा है तुमने कोई औलाद पैदा नहीं की क्यूंकि तुम्हारे यह गुर चंद दोस्तों के लिए तो अच्छे होंगे लेकिन मेरे देश के लिए नहीं। अच्छा है कि तुम्हारे परलोक सिधार जाने के साथ साथ यह गुण भी जलकर राख हो जायेगा।

मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि अगर तुम में थोड़ी भी ईमानदारी है तो एक बार लाइव में आकर जनता के सवालों का जवाब दो, सुरक्षा के घेरे में अपने भाड़े के भक्तों से नारे लगवाकर टीवी पर झूठ फैलाने का ड्रामा हम सबको समझ आता है। कभी देश के आम नागरिक से बात करो जो तुम्हारा भक्त न हो और जिसने भगत सिंह को पढ़ा हो न कि तुम्हारे गुरु गोवलकर, नाथूराम गोडसे या सावरकर को। मैं तुम्हे इस बात की भी चुनौती देता हूँ कि आईटी सेल बनाकर गालीबाज लौंडों की फ़ौज के पीछे छुपकर ट्वीट पे ट्वीट करने की बजाये सामने आकर बात करो फिर तुम देखोगे कि फर्जी फॉलोवर्स की भीड़ और असल लोगों में क्या फर्क होता है।

पता चला है कि जो कोई सवाल पूछता है उसे किसी न किसी तरीके से कानूनी कार्रवाई में फंसाने की चाल चल देते हो। घटिया राजनीति के दम पर यहाँ तक पहुँच गए हो लेकिन दिन जनता का भी आएगा और वो देश को बचाने के लिए आगे आएगी बशर्ते तब तक यह देश बिक न चुका हो।

कुछ दिन पहले भाषण में तुम्हे कहते सुना कि गाँधी के देश में लोगों को कानून हाथ में लेने की इजाज़त नहीं है। आज की बात करूँ तो आज गाँधी का राज नहीं है तुम्हारे हाथ में कमान है तो क्या तुम्हारे कहने का मतलब यह है कि मेरे भारत में क़ानून हाथ में ले लो पर जो लोग आज भी सोचते हैं कि देश गाँधी का है वो मामला अपने हाथ में न लें ?? तुमने देश की कमान चरखा कातने का नाटक करते फोटो खिंचवाने के लिए नहीं दी है। चरखा कातना है तो चलो हम तुम दोनों साथ में ग्रामीण भारत में चलते हैं और हथकरघा उद्योग के श्रमिकों के साथ चरखा कातते हैं तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ कि तुम्हारा वो दौरा कोई इवेंट नहीं होना चाहिए वहां कोई कैमरा नहीं होगा न कोई पत्रकार और उस दिन जितनी गांठें तुम कातोगे उस हिसाब से मजदूरी दिलवाने का वादा मैं करता हूँ क्यूंकि मैं आम नागरिक हूँ सरकार की तरह चोर नहीं जो मुकर जायेगा । जब तक तुम यह नहीं कर सकते तुम्हारी आम आदमी की नजर में छवि एक सेवक की नहीं बन पायेगी प्रधान सेवक की पदवी तो तुम भूल ही जाओ।

अब कोविंद नाम की चाल चल तुम मीडिया में फिर वाहवाही लुटोगे, तुम्हारे आईटी सेल के बेअकल बदतमीज लौंडे सब जगह पोस्ट वायरल करते फिरेंगे कि कितना बड़प्पन है प्रधानसेवक का जिसने दलित को देश का राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया; फ़्लान-ढिमकान लेकिन इतना हम सभी को पता है कि तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है। तुम्हे राजनीति करने का बहुत शौंक है न तो एक काम करो

  • यूजीसी नेट का जो कोटा तुम्हारी सरकार के इशारों पर काम किया गया है उसे पहले जितना या उस से दोगुना कर दो।
  • पहले की तरह नेट का एग्जाम साल में दो बार करवाने को आदेश जारी करो
  • नेट क्वालीफाई करने का जो मापदंड पहले था उसी मापदंड को वापिस लागू करवाओ।

मुझे पता है तुम नहीं करोगे, न ही तुम्हारे आका तुम्हे यह करने देंगे क्यूंकि देश को भगवा राष्ट्र जो बनाना है। देश में शिक्षा का स्तर ऊपर उठेगा तो नए लड़के-लड़कियां राजनीति में आएंगे और तुम या तुम्हारी गायकों- फिल्म अभिनेताओं या रूढ़िवादी सोच रखने वाले तुम्हारे साथियों में से किसी में भी इतना दम नहीं की उनके सामने टिक पाओ।

लेकिन वक़्त तो पलटेगा, हम पलटेंगे वक़्त को तुम कोई भी चाल चलो पलटवार करेंगे। एक को मारोगे तो दस खड़े होंगे दस को मारोगे तो दस हजार। लेकिन दुःख इस बात का है कि मरने वाला भी आम इंसान होगा और मारने वाले तुम्हारे प्यादे भी आम इंसान ही हैं। तुम्हारे गिरेबान तक कोई हाथ पहुंचे ऐसा हो नहीं सकता लेकिन; देश की युवा पीढ़ी लाचार नहीं है, वो पानी की तरह अपना रास्ता बना ही लेगी, वो समंदर भी लांघ लेगी और देशना एक दिन तुम्हारा तख़्त भी तुमसे छीन लेगी। इस से ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा तुम खुद समझदार हो और डरपोक भी क्यूंकि अपने खिलाफ उठती आवाजों को दबाने या ख़त्म करने के लिए बदनाम हो तुम पर मुझे परवाह नहीं, मैं आज भी लाल सलाम कहता हूँ और कल भी कहूंगा जब तक रिश्वतखोरी, लाल फीताशाही, फासीवाद, तर्क करने की आजादी पर रोक लगी रहेगी तब तक लाल सलाम कहना ही पड़ेगा हम आसमान तक यह नारा गूंजता ही रखेंगे।

कुछ शब्द संघियों और पालतू गुंडा तत्वों के लिए:

चंद पैसों के लिए काम करने वाले भाड़े के ट्टूओ हिम्मत है तो एक-एक कर सामने आओ, दस लोग एक आदमी पर टूट पड़ते हो हिम्मत है तो खुले में ललकार दो और जिसको मारने की कोशिश करते हो उसे भी अपने जैसा हथियार दो। फिर देखो तुम्हारा क्या हाल होता है। आम आदमी के सामने आओ, उसकी आँखों में देखो। शायद तब तुम्हे खौफ का एहसास तुम्हारी पतलून गीली होने की वजह से तुम्हे डर का एहसास हो। तुम इस लिए हो क्यूंकि तुम्हे देश की जनता का संरक्षण प्राप्त है। क्यूंकि जनता आज भी वहम में जी रही है। देश तरक्की राह पर है और तुम उस राह के कांटे हो। लेकिन राह में कांटे कितने भी हों मंजिल तक हम जरूर पहुंचेगे चाहे जख्मी ही सही लहूलुहान ही सही। टकराव होगा तो जवाब भी देंगे कामरेडों की तरह लेकिन अब सत्ता में एकाधिकार के तुम्हारे दिन ख़त्म हो चले हैं। अब देश की राजनीति में हर आम आदमी की भागीदारी होगी। सरकार किसी की माईबाप बने ऐसा माहौल ख़त्म करके ही दम लेंगे और हर कदम पर तुम्हारी सच्चाई लोगों के सामने बिखेरेंगे ठीक इसी तरह जिस तरह संघ ने झूठ और पाखंड को पूरे देश में फैलाया है। राजनीति और पावर पाने के लिए तुम इतना गिर चुके हो कि तुम्हें जन्म देने वाली माँ पर तरस आता है। शायद उसे भी खुद पर शर्म आती हो। संघ के वो लोग जो परदे के पीछे से खेल खेल रहे हैं और गौरक्षा के नाम पर बीफ बिज़नेस को अपने कब्ज़े में करने की फ़िराक में हैं याद रखना देशवासी तुम्हें छोड़ेंगे नहीं। तुम्हारी हर साजिश का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हम सब तैयार बैठे हैं। तुम एक को मारोगे दो पैदा होंगे दो को मारोगे बीस पैदा होंगे। तुम दस को जेल में डालोगे बीस और खड़े होंगे। तुम तैयार रहो तुम्हारा असली चेहरा सरे बाजार नंगा करके छोड़ेंगे। अनपढ़ और अपराधियों की फ़ौज पाल कर देश का माहौल ख़राब करने वाले हर शक्श हर संगठन को मुंह तोड़ जवाब दिया जाएगा।

इतना सब पढ़कर अगर तुम बौखलाहट या गुस्सा महसूस कर रहे हो तो मैं अपने मकसद में कामयाब हो गया और इतनी बात तुम भी समझ लेना कि आज का युवा हर परिस्तिथि को अपने पक्ष में पलटने का दम रखता है। तुम्हे लगी मिर्ची के लिए मैं बुरा महसूस करता हूँ लेकिन उसके लिए मैं नहीं तुम्हारी तरफ से देश भर में डाला गंद जिम्मेवार है। मैं इस गंद को साफ़ करने के लिए भी तैयार हूँ लेकिन उसके लिए भी रास्ता तुम खुद ही बनाओगे, अपनी बर्बादी की वजह की वजह तुम खुद ही बनोगे।

Office Politics, Work Ethics and You

Living in India is a very unique experience in itself. People from different cultures, states and regions; they all live happily or at least learn to adjust (in order to live happily) in this country. When we talk about a country the conversation cannot be completed without a discussion about the working class of the country. And when we talk about working class or work we do discuss a lot about Work Environment, Salary, Colleagues, Our bosses and what not. In most of the cases if we talk about mid-level, low-level management and the executive class of the organisations we will find a sense of dissatisfaction among the people. The dissatisfaction that’s not due to the work they are doing but due to the politics which, the upper hand plays in the offices.

Necessity is the mother of invention’ and this quote fits very well with the Indian Corporate World. Every Organization has a unique style of working, AND to find and bind those people together as a team is quite a difficult task. If a worker loves his/her work then it becomes very beneficial for the organization. Because when He/she works with full passion and his/her out of the box thinking/suggestions can really boost up the revenues of the organization. Reading this you will find the modus operandi for your growth and company’s success is quite a simple and straight road. But, indeed ‘it’s not’.

Only the wearer of a shoe can tell you where it bites! You love your work and have a bunch of ideas; you are supercharged with the energy to give it all to organization for its growth. But there are many pitfalls which won’t let you reach your destination that easily. There comes a time when you find yourself struck between office politics and work ethics. You start thinking what’s going wrong? Am I going in the right direction, does that idea we discussed in last meeting or over a phone call doesn’t worth to be implemented or if my ideas are impractical and will hamper the profits of organization?

Many thoughts jump in your mind and it’s quite possible that it will hurt you if you are tender at heart or you are sensitive about the ideas that were scrapped in the meeting or by your boss. But the only question that keeps haunting many of us is: “what is the real cause of this?” Is it like we lack imagination? Or is it just management doesn’t want to hear this from you and want you to work on what you are being asked to do?

These kinds of questions are quite obvious to those who really love their work or organizations and really want to see the growth; for rest of all Office Politics comes very handy.

For those who don’t want to participate in this kind of politics and just want to continue work sitting in a corner in order to pay their living expenses choose to follow the most common trend of Indian Public i.e. Adjustment.

I would not blame adjusters for what they do they have their own set of problems which change their behavior to become the one. But for every organization adjusters in large number are really harmful and sooner or later will make organization bleed.  In my opinion, if the number of adjusters in any organization (Specially Unstructured Organizations) grows to around 50-60% then the fall of organization is definite.

But the question is who are they? What, how and when they adjust and what they sacrifice?

The answers are quite simple but to understand it let’s discuss them in details. We all are made up of same blood, bones and flesh but, what makes every person unique is his/her thinking or perspective.  The statement holds true universally. Similar yet Unique we work at different organizations with different set of people. Some people like to play it safe at work and some are rebellious while some are so engrossed in their work that they don’t even move their gaze from their work registers or laptops.

We all behave differently because of our attitude about work, the work ethics that we follow and obviously the environment we work in. For most of us, Job is the only source of income that covers all our expenses; or if I say more precisely Our EMI(s). So when you have such monthly goals to achieve then it become really hard for you to take a risk by speaking in front of your boss or sharing a voice of disagreement about his decision with your colleague. Playing safe becomes the top priority for many of us. Many of us find their comfort zone restricting their thoughts to themselves and stick to 10 to 6 schedule. People who fall under this category think that speaking up against something going unfair will attract attention of the higher authorities and will distort his/her image, so better is to keep calm and never go out of line. Just like a child is told to fill colors in the given shapes of a drawing sheet. When you define boundaries and restrict yourself to those boundaries it makes you a safe player. And that “out of the box thinking” instinct starts killing itself there only.

Among the adjusters we will still find some people who despite knowing the consequences dare to speak a little and put forward their views to the management. The people who fall under this category generally align their views with their immediate bosses or with someone more powerful than them. It gives them a safeguard against getting fired that easily. This class of people get more chances of performance bonus/ appraisals and promotions.  But you need to keep you updated about the likes, dislikes and opinions of your favorite boss and you must not, keep it in your mind MUST NOT speak before your boss give his/ her opinion about something because you are there to endorse a decision/ opinion and not to give it before him/her.

Another kind of adjusters plays a dirty game in organization. They are just sniffers their work is to sniff out all the gossips which in trend at work. Add some of his/her own to it, twist someone’s statement and interpret it to their seniors. Though honed with professional skills they believe in the game of snakes and ladders. They believe in order to live in organization you need to adjust to the environment and play the moves according to his/ her boss to adjust themselves in the organization and try to climb the ladder where there seems no threat of snakes.

The list goes on and on but I think adjusters got enough mention in this article so let’s move to the next set of people and discuss about their work style.

There’s exists few people in every organization that are all set to take long leaps in their careers by playing smart moves. People fall under this category is an invisible threat to the integrity, longevity and revenues of the organization. This kind of people can be found in low and mid level management and are not harmful for Adjusters but for workers with ‘Out of Box Thinking’ and First Hand vision and voice they are as toxic as the deadliest snake on the earth. This leaps they take in their career is always due to the politics they play in the offices. Their career and work experience comprises of 30/70 skill set i.e. 30% skills 70% Politics. They believe in perfecting their office politics skills and can fool anyone in upper management. They have more tricks in hand than the feather in their hat. They generally try to eliminate people of lower management level and executive level with the vision to grow and work on their out of the box thinking. The intellectual and creative people need their own space to work but this kind of people play dirty politics to kill their voices to keep them alive and in top position. This kind of people generally criticize people and drain the confidence of the organizations people and then order them to work according to his/her wish just to prove that his/her ideas work and he/she is the Savior of the organization. This kind of people’s prime focus is self growth and organizations growth is a secondary thing for them. But they pose like they are ready to live and die for the organizations they work for. Leg pulling, Blame game, Finding Faults in everything is the part of their work and that’s the ladder to their success. There are adjusters and others who too want to climb the ladder of success like him and proudly declare him/her their role model.

Another class of workers in the organization who believes to work freely without boundaries, for them help organization realizing its goal and to stand for the rights of the team are the only goals which they work for. It’s nothing like they don’t want personal growth with the growth of the organization but. That’s the least concerned thing for them. But for this kind of people working in Indian Corporate World is nearly impossible. Because in India there lays many traps that are set to disrupt your workflow and make you fall in pitfalls. Because, one can take work out of Politics here but cannot take politics out of work in Indian Corporate World.

The Last but not the least, there are Stakeholders of the organizations who turn blind eye to the needs and ideas that can really be converted into cash if implemented at right time with right persons. Most of the corporate see what they are earning today. The trends, working style, presentations, formal rules remain the same as if they are the only way to live life and survive.

Between this tussle of Authority, Growth, fame and Creativity Indian Corporate World keep wearing a clown’s mask and live life 9 to 5, 10 to 6 or 2 to 10.

भूखे को रोटी तक नहीं दिल पाया निकम्मा नोट 1000 का

काले धन को लेकर सरकार की परेशानी से तो पूरा देश वाकिफ है लेकिन यह परेशानी एक आम आदमी की ज़िन्दगी में इस कदर परेशानियां ले आएगी यह 8 नवम्बर 2016 से पहले किसी ने सोचा न था।

देश के कोने-कोने में से देश की आम जनता जहाँ मोदी सरकार के इस फैसले की तारीफ कर रही थी वहीँ सफर कर रहे, बिमारियों से जूझ रहे, खाने की तलाश में ढाबों पर डेरा जमाने वाले लाखों लोग मोदी के इस फरमान की वजह से गालियों की नॉनस्टॉप पेशकश देने में भी लगे हुए थे।

किसी के लिए सवाल था दवाई का, किसी के लिए घर पहुँचने के लिए लिए जाने वाले टिकट का और किसी के लिए रोटी का इन सभी सवालों का हमेशा से जवाब बनते आये 500 और 100 के नोटों को आज इस तरह से अनदेखा किया जा रहा था जैसे नोट पर छपे गांधी जी की तस्वीर से लेनदेन करने वालों को नफरत हो गयी हो।

चारबाग़ रेलवे स्टेशन पर भी हाल कुछ अजब सा था। जेब में पैसा लिए सीन फुलाये घूमने वाले आज चाय तक के लिए तरसते फिर रहे। न तो टिकट बेचने वाले एजेंट की नजर में 500 और हज़ार के नॉट की कोई कीमत थी और न ही उनके बदले कोई भूखे मुसाफिर को कहना देने को राजी था।

Political Murder of Rohith Vemula

पुराने वक़्त की बॉलीवुड फिल्मों में जैसे हीरो के गुंडों को पीट पीट अधमरा करने के बाद पुलिस आखिर में पहुँचती थी ठीक वैसे ही देश के नेता अपनी राजनितिक रोटियां सेंकने के लिए किसी भी हादसे के बाद पहुँच ही जाते हैं। फिर शुरुआत होती है देश के लोगों की तरफ से चुने गए देश सेवकों के राजनितिक बयानों की।

ऐसा ही कुछ माहौल देखने को मिल रहा है इतवार के दिन हैदराबाद यूनिवर्सिटी में हुई दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की मौत के बाद। जहाँ एक तरफ इस घटना के बाद से ही देश भर में स्टूडेंट एसोसिएशन्स ने सड़कों पर आकर सरकार और यूनिवर्सिटी के खिलाफ जबरस्दस्त प्रदर्शन शुरू कर दिया है वहीँ देश की राजनितिक पार्टियां अपनी रोटियां सेंकने में लगी हैं। इसी कोशिश में आज जहाँ कांग्रेस उप-अध्यक्ष राहुल गांधी हैदराबाद पहुंचे वहीँ आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के सी एम अरविन्द केजरीवाल ने मोदी सरकार के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया है।

हालाँकि देश में जो घटना हुई है उसे लेकर हर किसी के मन में गुस्सा है और गुस्सा आना जायज़ भी है लेकिन सवाल यह उठता है कि राजनितिक पार्टियां जिन्हें देश में हो रही हर घटना की खबर रहती है वो दंगों, आत्महत्या, या ऐसे और मुद्दों पर बात हाथ से निकल जाने के बाद ही क्यों बयानबाज़ी शुरू करती हैं या मौके पर पहुँचती हैं।

अरविन्द केजरीवाल ने आज मीडिया में दिए एक बयान में कहा है कि रोहित वेमुला ने आत्महत्या नहीं की है उसकी मौत राजनितिक कारणों की वजह से हुई है, दलितों की ज़िन्दगी सुधारना मोदी सरकार की संवेधानिक जिम्मेवारी है लेकिन मोदी सरकार के नेताओं ने दलित स्टूडेंट्स को ससपेंड करवाया और परेशान किया है। यह डेमोक्रेसी, इन्साफ और बराबर के हक़ों का क़त्ल है।

गौरतलब है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी के एक दलित रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला ने पिछले साल यूनिवर्सिटी से बिना वजह सस्पेंड किये जाने के बाद इतवार के दिन फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी। अपने सुसाइड नोट में रोहित ने इसके पीछे की वजह कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ से किये जा रहे भेदभाव और उन्हें क्लासेज लगाने के लिए बहाल न किया जाना बताया है। रोहित की आत्महत्या के बाद की जांच में पता चला है कि रोहित और उसके चार साथियों को बिना वजह के परेशान किया जा रहा था। हालाँकि पुलिस ने यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर और यूनियन लेबर मिनिस्टर बंदारु दत्तात्रेय के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है लेकिन इस केस का अंजाम क्या होगा वो तो आप भी समझते ही होंगे।

Slaughter of a ‘Dalit’ – दलित की बलि

कल इतवार का दिन देश के इतिहास में एक ऐसा काला दिन बनकर सामने आया जिसने सैंकड़ों सालों  से चली आ रही भेदभाव की नीति को नंगा कर दिया। खबर मिली कि पिछले साल हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रहे पांच दलित रिसर्च स्कॉलर्स जिन्हें पिछले साल एक मामूली सी बात पर हुई बहस के बाद कॉलेज से निकाल दिया था में से एक ने अपने साथ हो रहे भेदभाव से तंग आकर हॉस्टल के कमरे में फंदा लगाकर अपनी जान दे दी।

बहुत से मीडिया चैनलों ने इस खबर को सिर्फ एक मौत की खबर की तरह पेश किया। टीवी पर जोर जोर से चिल्लाने वाले कुछ मश्हूर एंकरों ने अपने गले का पूरा ज़ोर लगाया भी तो यह कहने के लिए कि फांसी अपनी नाकामियों की वजह से लगायी गयी है। कुछ का कहना है यूनिवर्सिटी में दादागिरी करने वाले लोगों में से एक गिनती काम हो गयी। जहाँ एक तरफ कुछ चैनल फांसी के पीछे की असल वजह छुपाने को लगे हैं वहीँ कुछ ने इस खबर की तरफ से मुँह मोड़ने का फैसला कर और ख़ास ख़बरें दिखाना शुरू कर दिया है।

लेकिन सवाल अभी भी ज्यूँ का त्यूं ही है कि आखिर फांसी लेने वाले स्कॉलर रोहित वेमुला ने फांसी ली है या उसकी बलि दी गयी है ?

लोग चाहे कुछ भी कहें लेकिन देश की राजनीति की शतरंज की चालें देखें तो शायद आप भी समझ जायेंगे की रोहित वेमुला ने आतांहत्य नहीं की बल्कि उसकी बलि दी गयी है। उसकी बलि दी गयी है दलितों की आवाज़ दबाने और मनुवाद को हमेशा के लिए कायम रखने के लिए।

सत्ता में बैठे लोग नहीं चाहते की उनके खिलाफ कोई दलित आवाज़ उठाये। सत्ताधारी मनुवादी अपनी नीति और नीयत दोनों पर कायम है और वो कल भी यही चाहता था और आज भी यही चाहता है कि दलित उसके पैरों की जूती बनकर रहे, उसके मंदिरों में दान करे, घर में काम करे, उसकी जूतियां चमकाए और सर पर मैला धोए और वक़्त आने पर उसके कहने पर उसकी पार्टी को वोट करे। लेकिन आज जब एक दलित ने अपने और दूसरे धर्मों के लोगों के लिए आवाज़ उठाने की कोशिश की तो उसे तंग कर उसे इन हालातों में पहुंचा दिया कि वो खुद अपनी बलि देने के लिए तैयार हो गया।

इस आतमहयता को बलि कहने की वजह साफ़ होती है नीचे दिए गए इन खतों से जिनमें से एक खत आंध्रा प्रदेश के लेबर और एम्प्लॉयमेंट मिनिस्टर बंदारु दत्तातरया ने एच.आर.डी. मिनिस्टर स्मृति ईरानी को लिखा है और कहा है कि हैदराबाद की यूनिवर्सिटी देश विरोधी राजनीति और कट्टरवादी लोगों का अड्डा बन गयी है। बंदारु दत्तातरया ने अपने इस खत में कहा है कि अम्बेडकर अटूडेंट्स एसोसिएशन ने याकूब मेमन को फांसी दिए जाने पर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन किया है। बंदारु दत्तातरया ने मांग की थी की अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के मेंबरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। ऐसे में केन्दर सरकार के दवाब के चलते यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर ने स्टूडेंट्स एसोसिएशन के पांच ख़ास मेंबरों को ससपेंड कर दिया और तब से लेकर अभी तक इन स्टूडेंट्स को यूनिवर्सिटी ने बहाल नहीं किया है।

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घटना में शामिल एक दूसरा स्टूडेंट फ्रंट ABVP जो कि आरएसएस का ही एक एक यूनिट है ने भी दवाब बना कर इन स्टूडेंट्स को यूनिवर्सिटी निकलवाने के लिए काफी मेहनत की थी। सभी जगह ऊंचे मुकामों पर डेरा डाले बैठे मनुवादी सोच के लोगों ने ससपेंड किये स्टूडेंट्स को निकाल कर दोबारा बहाल ना करने का फैसला किया जिससे न सिर्फ इन स्टूडेंट्स का भविष्य खराब हुआ बल्कि उनमें से एक ने ऐसा राह चुन लिया जहाँ से वापिस आना नामुमकिन है।

रोहित वेमुला की बलि दलित समाज और बाकी माइनॉरिटी ग्रुप्स के लिए मनुवादियों की तरफ से दिया गया एक पैगाम है कि जो भी उनकी सरकार का तख्ता पलट करने की तरफ एक कदम भी उठाएगा उसका यही हश्र होगा।

Balancing Act of BJP: Adnan Sami gets Indian Citizenship

तेरी ऊंची शान है मौला“, “कभी तो नज़र मिलाओ” और बजरंगी भाईजान में “भर दो झोली मेरी” जैसे हिट गाने देने वाले पूरी दुनिया में मसहूर पाकिस्तानी कलाकार अदनान सामी की अर्ज़ी पर गौर करते हुए बीजेपी सरकार ने अदनान को हिंदुस्तान की सिटीजनशिप दे दी है; आज से अदनान देश में बिना किसी वीज़ा के रह सकते हैं।

अदनान को सिटीजनशिप का सर्टिफिकेट कैबिनेट मंत्री किरण रिज्जू ने दिया इस मौके पर अदनान की पत्नी रोया भी मौजूद थी। अभी थोड़े दिन पहले ही अदनान ने अपने एक बयान में कहा था कि अगर देश में इनटॉलेरेंस होती तो वह देश की सिटीजनशिप के लिए कभी भी अर्ज़ी नहीं देते।

गौरतलब है कि अदनान काफी वक़्त से हिंदुस्तान आ रहे हैं और वो अपने वीज़ा के खत्म होने पर भी देश में अर्ज़ी जमा करवा कर वीज़ा बढ़वा चुके हैं। देश में पिछले काफी वक़्त से चल रही इनटॉलेरेंस के मुद्दे पर बहस और ऐसे में अदनान का सरकार के हक़ में बयान देना तो इस बात की तरफ तो इशारा करता ही है कि सरकार को इस खेल में जिस मोहरे की जरुरत थी वो उन्हें अदनान में मिल गया और इस तरह बीजेपी ने बैलेंसिंग एक्ट करते हुए एक बार फिर सरकार कायम रखने के लिए बढ़िया चाल खेली है।

देश की सड़कों पर घूम रहे हैं 75000 से भी ज़्यादा पढ़े-लिखे भिखारी।

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उनके कपड़े, चेहरे के हाव-भाव, मदद के लिए फैले हाथ शायद आपको अपनी जेबें टटोलने पर मजबूर कर देते हों लेकिन जनाब ज़रा आंकड़ों पर नज़र डालिये तो आपके दिलों में इनके लिए जाएगी हमदर्दी कुछ पल के लिए ही सही लेकिन गायब जरूर हो जाएगी।

बिलकुल यही हुआ उन लोगों के साथ जिन्होंने 2011 में किये एक सर्वे रिपोर्ट को पढ़ा। दरअसल ‘ Non-Workers by Main Activity and Education Level’ नाम की इस हफ्ते रिलीज़ हुई इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है की देश की सड़कों पर घूम रहे करीबन 3.72 लाख भिखारियों में से करीब 21% यानि 75000 भिखारी 12 वीं पास हैं। इसके इलावा कुछ महारथी तो ऐसे भी हैं जिन्होंने बी-टेक, एमबीए या कोई और प्रोफेशनल कोर्स भी कर रखा है।

ऐसा नहीं है कि देश के इन लोगों के पास नौकरियां है नहीं या पहले नहीं थीं। इन लोगों ने खुद यह पेश चुना है ताकि यह मुफ्त के पैसे पर ऐश कर सकें और जबकि ट्रैफिक सिग्नल पर रुकने वाले लोगों में से बहुत से लोग लाल बत्ती पर यही सोच रहे होते हैं की महीने का खर्च कैसे काम किया जाए। रिपोर्ट में तो यहाँ तक भी लिखा है कि कुछ पढ़े लिखे भिखारियों के पास तो नौकरी भी है लेकिन फिर भी मुफ्त के पैसे की लत ऐसी लगी हुई है की वो भीख मांगने को साइड बिज़नेस की तरह मानकर चलते हैं। ऐसे ही एक भिखारी या यूँ कहें कि बिज़नेस मैन की बात करें तो १२वीं पास दिनेश कोढाभाई जो अहमदाबाद के भद्रकाली मंदिर के बाहर बैठ अपना भीख का धंदा चलते हैं ने फर्राटेदार अंग्रेजी में बोलते हुए सर्वे टीम से कहा “I may be poor but I am an honest man. I beg as it fetches me more money, Rs 200 a day. My last job of a ward boy in a hospital got me only Rs 100 a day” इतनी फर्राटेदार इंग्लिश अगर वो किसी कंपनी की इंटरव्यू में बोलता तो शायद उसे भीख मांगने की कभी जरुरत ही न पड़ती।

ऐसी ही एक उदाहरण है दशरथ परमार की जो करीबन (52) साल के हैं। दशरथ के पास एम-कॉम की डिग्री है जो उसने गुजरात यूनिवर्सिटी से हासिल की है लेकिन सरकारी नौकरी न मिलने और प्राइवेट कंपनी में दिल न लगने की वजह से दशरथ ने भीख मांगे का रास्ता चुना।

भिखारियों के लिए काम करती एक संस्था ‘मानव साधना’ के बिरेन जोशी ने अपने इंटरव्यू में कहा: ” इन भिखारियों को दुसरे कामों में लगाना बहुत मुश्किल काम है क्यूंकि मुफ्त के पैसे की आदत इन्हें फिर से इसी काम में खींच लाती है”
आखिर में हम कह सकते हैं अगर भीख मांगने की इस बीमारी को देश से खत्म करना है तो भीख मांगने को सरकार या क़ानून की तरफ से जुर्म करार दिया जाना चाहिए जिससे न सिर्फ लोगों की ज़िन्दगी बदलेगी बल्कि देश की छवि भी बदलेगी।