उल्फा आतंकवादी अनूप चेतीआ को जमानत एक सोची समझी चाल या कानून की भूल ??

देश की पुलिस और सरकार को उसकी 20 सालों से तलाश थी।  उसके ऊपर क़त्ल, अपहरण और जबरन वसूली करने के मामले दर्ज थे।  बांग्लादेश में वो नकली पासपोर्ट रखने, उस पर सफर करने, गैरकानूनी हथियार रखने और गैरकानूनी ढंग से 16 देशों की करेंसी रखने के जुर्म में जेल की सजा काट रहा था। यही नहीं असम को एक अलग देश बनाना उसका एजेंडा था जिसके लिए वो आतंकवादी संगठन उल्फा के लिए काम करता था।

11 नवंबर 2015 को भारतीय सरकार की कोशिशों के बाद बांग्लादेश सरकार ने अनूप चेतीआ उर्फ़ सुनील बरुआह उर्फ़ भाईजान उर्फ़ अहमद को भारत की सरकार के हवाले कर दिया; शायद इस उम्मीद के साथ के साथ कि बाकी की उम्र अनूप भारत में सलाखों के पीछे गुजरेगा लेकिन यहाँ जो हुआ बिलकुल अलग हुआ महज दो महीनों में ही अनूप को जेल से जमानत मिल गयी और अनूप चेतीआ एक बार फिर आज़ाद है।

अब सवाल यह उठता है जहाँ एक तरफ पुलिस और सरकार एक तरफ देश में अलप्संख्यकों यानि माइनॉरिटीज के किये छोटे से जुर्म पर इतनी सख्ती दिखती है वहीँ चेतिा जैसे मुजरिम को  कहाँ तक सही है ??

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